BLOG: बच्चों पर उम्मीदों का बस्ता लादने से पहले हम ये समझें कि सफलता आखिर क्या है?

Preet Kaur | 29 May 2018 05:26 PM

प्रतीकात्मक तस्वीर

उम्मीदों का बस्ता बच्चों के सिर पर धरने का समय आ गया है. रिजल्ट आ गया है. स्ट्रीम्स तय हो चुके हैं, कोर्सेज चुने जा चुके हैं. लेकिन एक हूक है जो उठ रही है. काश, बच्चा किसी मोस्ट वांटेड विषय में चला जाए. जिंदगी बन जाएगी. कामयाबी कदम चूमेगी. हम राजा बन घूमेंगे. गर्व से छाती छप्पन इंच हो जाएगी. मिथकीय सफलता की प्रकृति ऐसी ही है. सपना दिखाती है. इसे हम खुद देखते हैं, बच्चों को दिखाते हैं. सफलता के यूफोरिया और असफलता के कलंक के साथ आगे बढ़ते जाते हैं. मार्केट जो प्रोडक्ट बनाना चाहता है, उसी के सांचे में ढलने को तैयार होते जाते हैं.


सांचे बनाए जा रहे हैं और हम उसमें अपने सपने ढालने को बेचैन हैं. मध्य वर्ग का सपना सेटेल होने का सपना है. साइंस और कॉमर्स में सेटेल होने की उम्मीद ज्यादा दिखती है. क्योंकि बाजार को ऐसे ही प्रोडक्ट्स चाहिए. समकालीनता के लिए गणित जरूरी है. पूंजीवाद में कैलकुलेशन की सटीकता चाहिए चूंकि अर्थशास्त्र इसी को चाहते हैं. साइंस बिना गणित के संभव नहीं. संभव है तो स्कोप नहीं. तो, स्ट्रीम ले ली. फिर प्राइवेट ट्यूटर से लेकर कोचिंग सेंटर और इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेजों में एंट्री के लिए इम्तहान दर इम्तहान. सांस लेने की फुरसत नहीं. किसी टीएनजर से बात करके देखिए उसमें एक सोशल फैक्ट के दर्शन होंगे. वह और कुछ नहीं, एक उत्पीड़क व्यवस्था का प्रोडक्ट बन चुका है. इस व्यवस्था में बढ़ती आबादी और तमाम असमानताओं के साथ अवसर लगातार छीन रहे हैं और उम्मीदवार बढ़ रहे हैं. ऐसे में एक दूसरे के सिर पर पैर रखकर आगे बढ़ने की आक्रामकता चरम पर है.


यह सफलता मिथक से ज्यादा क्या है?  इस मुक्त आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में सफलता दरअसल विषयों की हेरारकी पर आधारित है. विज्ञान-गणित इसमें ऊंची पायदान पर चढ़े हुए हैं. सुपीरियर और प्रैक्टिकल हैं. आर्ट्स या ह्यूमैनिटीज निचली पायदान पर ढकेल दिए गए हैं. इनका कोई भविष्य नहीं है. तेज दिमाग बच्चे इनकी तरफ नहीं जाते. स्कूल से लेकर घर तक रोजाना यही पाठ पढ़ाया जाता है. बच्चे भी समझने लगते हैं कि मेडिकल साइंस-इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट के बिना जिंदगी स्याह होने वाली है. इसीलिए क्योंकि सफलता नौकरियों की हेरारकी के इर्द-गिर्द घूमती मानी जाती है. जिन नौकरी में पैसा, स्टेट पावर और टेक्नोक्रेसी है, वह सुपीरियर है. अगर आईआईटी-आईआईएम-यूपीएससी क्रैक कर लिया तो यह सब आपकी जेब में होगा. प्लेसमेंट सोसायटी में सफलता का इंडेक्स तय करता है. मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाला ब्ल्यू कॉलर्ड प्रोफेशनल जब नोएडा की गेटेड कम्युनिटी में बसा होता है तो वह किसी दो कमरे के घर रहने वाले साधारण पत्रकार से सफल माना जाता है जो पचास साल जिंदगी जी कर भी कलम घिसे जा रहा है. इसी तरह सरकारी बंगला, लाल बत्ती वाली गाड़ी और चहुं ओर सरकारी कर्मचारियों की ब्रिगेड हो तो आप मध्ययुगीन राजनीतिक व्यवस्था पर पेपर लिखन वाले मास्टर से सफल हैं.


लेकिन इस मिथकीय सफलता के अपने असंतोष भी हैं. अक्सर वह एक आयामी होती है. आदमी की रचनात्मकता और जीवन ऊर्जा को हर लेती है. आप कामयाब हो गए तो, नाकाम रहे तो... हर साल कितने ही नाकाम लोगों की फौज तैयार होती है. जिनके सपने टूटते हैं. इन सपनों के लिए साल के साल रिपीट किए जाते हैं. फिर रद्दी भाव से जो मिलता है, बटोर लेते हैं. हां, ध्यान रखा जाता है कि कोई प्रोफेशनल कोर्स लिया जाए. सफलता बड़ी न हो तो छोटी ही सही, लेकिन इस सिस्टम में सफलता क्या है... जीतता कोई नहीं, सब हारते ही हैं. पीछे छूट जाने की हार. नब्बे परसेंट आए तो पंचानवे परसेंट से हारे. पंचानवे परसेंट आए तो सौ परसेंट के पीछे. सौ परसेंट आए तो विदेश पढ़ने न जा पाने का दुख. इंजीनियरिंग के बाद यूएस में नौकरी न मिलने का दुख. यूएस में नौकरी मिली तो किसी कलीग के महंगे अपार्टमेंट को देखकर ईर्ष्या से भरने का दुख. मिथकीय सफलता में कइयों को असफल होने का दुख भी सालता रहता है.


सफलता वह नहीं, जो हमें बाहर दिखती है. सफलता का एहसास अपने भीतर ही होता है. बड़े होने के नाते, हमें खुद पहले सफलता की परिभाषा ठीक से समझने की जरूरत है. सिर्फ कहने से काम चलने वाला नहीं कि मेरी संपत्ति मेरे बच्चे ही हैं. इसे खुद भी अच्छी तरह समझना होगा. चूंकि सफलता का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है आप खुश हैं- संतुष्ट हैं तो यही सफलता है. विज्ञान पढ़ने वाले हर बच्चे को आईआईटी जाने की जरूरत नहीं और न ही कॉमर्स के बाद सिर्फ मैनेजमेंट में जाना जरूरी है. हमारे समाज को इंजीनियर, डॉक्टर चाहिए तो सिनेमा बनाने वाला भी और इतिहास पढ़ाने वाला भी. संगीतकार भी हमें चाहिए और साहित्यकार भी. क्या हर बच्चे में कोई न कोई कौशल नहीं होता जो उसे दूसरों से अलग करता है. बचपन में हम अक्सर उसके सामने ‘आंटी को गाना गाकर सुनाओ’ की फरमाइश रखते हैं. फिर उसकी संगीत की ललक को यह कहकर दबाते हैं कि यह तो पासटाइम के लिए था. इसीलिए टेनिस के धुरंधर खिलाड़ी को भी साइंस की किताबों के नीचे दबाने की कोशिश करते हैं.


केवल प्रोफेशन हमें हमारी कामयाबी नहीं देते. अक्सर प्रोफेशन बदलकर भी हम अपने जीवन का मकसद समझ सकते हैं. यही सफलता का पैमाना है जो मिथकीय सफलता से एकदम दूर ले जाता है. हमें खुद और अपने बच्चों को इसी मकसद को साधने के लिए तैयार करना होगा.


(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)